Author : Achraya (Dr.) Kailash Chandra Dev Brahaspati
राष्ट्रभाषा हिन्दी के साहित्य की समुन्नति एवं संवृद्धि के लिए उत्तर प्रदेश प्रशासन ने हिन्दीसमिति के तत्त्वावधान में विविध विषयों के ग्रन्थ प्रकाशित करने की जो योजना बनायी थी, उसी के अन्तर्गत यह पुस्तक प्रकाशित की जा रही है। इसमें महर्षि भरत के संगीत-सिद्धान्त का सम्यक् विवेचन किया गया है। इसके लेखक हैं सनातनधर्म कालेज, कानपुर के यशस्वी प्राध्यापक श्री कैलासचन्द्र देव बृहस्पति । यह हिन्दी समिति ग्रन्थमाला का २८वाँ पुष्प है । लेखक के पूर्वज, कम से कम चार पीढ़ियों से, रामपुर राज्य के दरबार में रहे हैं, अतः संगीतसम्बन्धी संस्कार उन्हें प्रायः आनुषंगिक रूप से ही प्राप्त हुए हैं। उन्हें ऐसे सद्गुरुओं के चरणों में बैठकर स्वर-साधना करने का अवसर प्राप्त हुआ है जिन पर आज के अनेक सुप्रसिद्ध एवं सुसम्मानित संगीत शास्त्रियों की भी अपार श्रद्धा है। अनेक विद्वानों की सत्संगति और अभ्रान्त पथ प्रदर्शन का भी सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। इसके सिवा उन्होंने भरत के मूल नाट्यशास्त्र, शा देव के संगीतरत्नाकर आदि अनेक ग्रन्थों का वर्षों से अनुशीलन और मनन किया है, जिसकी स्पष्ट छाप हमें इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में देखने को मिलती है। प्रस्तुत ग्रन्थ महर्षि भरत के नाट्य शास्त्र का अनुवाद नहीं है। यह उनके संगीतसम्बन्धी सिद्धान्तों याख्यात्मक विवेचन एवं मण्डनात्मक विश्लेषण है । भरत मुनि ने संगीत के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा, कालगति के प्रभाव से वह दुर्बोध होने लगा था, अतः उनके विचारों को ।
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