Acharya Kailash Chandra Dev Brahaspati’s life was a remarkable blend of scholarship, music, and devotion to the Indian classical tradition. His journey reflects his unwavering dedication to preserving and advancing the art of music.
रामपुर दरबार ने अनेक महान कलाकारों, संगीतज्ञों और संगीतशास्त्रियों को जन्म दिया है। इस दरबार से संबंध रखने वाले विद्वानों में आचार्य बृहस्पति अंतिम संगीत शास्त्री थे। वर्तमान युग के किसी भी संगीत प्रेमी के लिए आचार्य बृहस्पति का नाम अज्ञात नहीं है। इस महान व्यक्तित्व ने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय संगीत को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए समर्पित कर दिया। बचपन से ही इस त्यागमूर्ति ने अपना जीवन संगीत की सेवा और अध्ययन में लगा दिया।
आचार्य बृहस्पति का जन्म रामपुर में 20 जनवरी 1918 को हुआ। आपकी चार पीढ़ियाँ रामपुर में ही निवास करती रही हैं। बृहस्पति जी के परदादा पंडित दत्तराम जी रामपुर रियासत के राज पंडित थे। वे प्रकांड पंडित, ज्योतिष शास्त्र एवं गणित के ज्ञाता, सिद्ध तांत्रिक, कवि और संगीतज्ञ भी थे। वे रामपुर नरेश नवाब कलबे अली खां के राजदरबार में राज्यसभा के रत्न माने जाते थे।
एक बार उनकी अद्भुत भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई, जिससे प्रसन्न होकर नवाब साहब ने उनके लिए एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया। यह शिवालय आज भी रामपुर में स्थित है और इस वंश की विद्या एवं कीर्ति का अमर प्रतीक है। इस मंदिर के निर्माण में मुसलमानों द्वारा अनेक अवरोध उत्पन्न किए गए, किंतु नवाब साहब ने पंडित दत्तराम जी को दिया गया अपना वचन पूर्ण किया।
आपके पिता पंडित गोविंदराम जी एक विद्वान संस्कृत पंडित तथा शिक्षक थे, जिनके संरक्षण में बालक कैलाशचंद्र ने संस्कृत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। पुरातन और आधुनिक प्रशिक्षण पद्धति के समन्वित रूप ने आचार्य जी के बहुमुखी व्यक्तित्व का निर्माण किया। उन्होंने बाल्यकाल से ही सद्गुरुओं के चरणों में बैठकर विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन किया तथा काव्य और संगीत कला की साधना की।
आचार्य जी का जीवन प्रारंभ से ही संघर्षमय रहा। जब उनकी आयु मात्र दस वर्ष थी, तभी उनके पिता का देहांत हो गया। इसके पश्चात उनकी माता ने अत्यंत साहस और धैर्य के साथ उनका पालन-पोषण किया। माता द्वारा दिए गए संस्कार इतने दृढ़ थे कि बालक कैलाशचंद्र धीरे-धीरे एक विलक्षण व्यक्तित्व के रूप में विकसित होते चले गए। वे सदैव अपनी वंश-परंपरा की रक्षा के प्रति सजग रहे।
साढ़े तीन वर्ष की आयु में उनका उच्चारण पूर्णतः शुद्ध हो गया था। पाँच वर्ष की आयु में वे संस्कृत के अनेक श्लोक कंठस्थ कर चुके थे। दस वर्ष की आयु में उन्होंने एक संस्कृत श्लोक की रचना कर सभी को चकित कर दिया। चौदह वर्ष की आयु में उन्होंने सुंदर काव्य रचना की। सन 1936 ईस्वी में उन्होंने लाहौर से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की।
एक बार अयोध्या की एक पंडित सभा में उन्होंने संस्कृत में स्वयं श्लोक रचना की, जिसकी समस्त पंडित सभा ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की। इस अवसर पर उन्हें ‘काव्य मनीषी’ तथा ‘साहित्य सूरी’ की उपाधियाँ प्रदान की गईं।
आचार्य जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके पिता के श्रीचरणों में हुई। उनकी माता नर्मदा देवी अत्यंत धार्मिक, ज्ञानवती, दृढ़ विचारों वाली एवं स्वाभिमानी महिला थीं। उन्होंने अपने होनहार पुत्र को हर प्रकार की शिक्षा प्रदान की और उचित संस्कार देकर अपने कुल की मर्यादा एवं प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया।
अलंकार शास्त्र की शिक्षा उन्होंने महामहोपाध्याय पंडित परमेश्वरानंद शास्त्री से, न्याय की शिक्षा स्वर्गीय पंडित हरिशंकर से, व्याकरण की शिक्षा पंडित छेदीलाल झाझी से तथा प्रारंभिक शिक्षा पंडित कन्हैयालाल शुक्ल, राजपंडित रामचंद्र शास्त्री एवं अपने पितृचरणों से प्राप्त की। कंठ संगीत में वे रामपुर दरबार के स्वर्गीय मिर्जा नवाब हुसैन के शिष्य थे तथा ताल-व्यवहार में उसी दरबार के मार्दंगिक स्वर्गीय पंडित अयोध्या प्रसाद जी से दीक्षित थे। मृदंग, तबला तथा प्रौढ़ स्वर-ज्ञान पर उनकी सिद्धि दुर्लभ गुरु-कृपा का ही परिणाम थी।
शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात सन 1942 में उनका विवाह साधना देवी जी से संपन्न हुआ।
लाहौर से अध्ययन कर लौटने के बाद रामपुर में उन्हें अध्यापक पद प्राप्त हुआ, जिस पर उन्होंने कुछ समय तक कार्य किया। किंतु उनकी प्रतिभा इस सीमित क्षेत्र में बंधी नहीं रह सकी। अतः उन्होंने वह पद छोड़ दिया और धर्म एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार हेतु रेडियो के लिए विविध साहित्यिक रचनाएँ करने लगे। इसी अवधि में उन्होंने रेडियो के लिए अत्यंत उत्कृष्ट नाटकों और काव्य की रचना की। इन नाटकों के माध्यम से उन्होंने भारत के गौरवशाली अतीत की महिमा को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया।
आवश्यकता पड़ने पर वे इन नाटकों में स्वयं अभिनय भी करते थे तथा निर्देशन की भूमिका भी निभाते थे। कई बार उन्होंने स्वर परिवर्तन के माध्यम से एक साथ अनेक पात्रों का सफल अभिनय किया। उनके अनेक रेडियो रूपकों का अनुवाद भारत की अन्य प्रादेशिक भाषाओं में भी किया गया।
दिसंबर 1949 में वे कानपुर के विक्रमाजीत सिंह सनातन धर्म कॉलेज में धर्माचार्य के पद पर नियुक्त हुए। वस्तुतः यहीं से उनके जीवन का स्वर्णकाल आरंभ होता है। कॉलेज में रहते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय पद्धति से अध्ययन कर बी.ए., एम.ए. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ सम्मानपूर्वक प्राप्त कीं। इसके पश्चात वे धर्मोपदेश के साथ-साथ बी.ए. एवं एम.ए. कक्षाओं में हिंदी साहित्य का अध्यापन भी करने लगे।
वे एक अत्यंत लोकप्रिय और सफल अध्यापक सिद्ध हुए। कठिन, गूढ़ और जटिल विषयों को सरल एवं सुबोध ढंग से समझाना उन्हें सहज रूप से आता था।
बाल्यकाल से ही उन्हें संगीत की शिक्षा एवं संस्कार प्राप्त हुए थे। निरंतर अभ्यास और मनन से उन्होंने इसे निरंतर उन्नत किया। कॉलेज में वे अपने संगीत-प्रेमी साथियों के साथ घंटों तक संगीत चर्चा, रागों का स्वरूप निरूपण और उनका प्रस्तुतिकरण करते रहते थे।
वे अपने साथियों से प्रायः कहा करते थे कि अब वे जीवन में प्रतिष्ठित हो चुके हैं और यही समय है अपने गुरुजनों के आदेश का पालन करने का। यह आदेश क्या था, इसका वर्णन उन्होंने स्वयं अपने शब्दों में किया है।
रामपुर दरबार के गायक स्वर्गीय मिर्जा नवाब हुसैन सैयद ने अपने अंतिम समय में अपने प्रिय शिष्य बृहस्पति से कहा कि संगीत का अभ्यास करो, शास्त्रों को समझो और उन पर श्रद्धा रखो। ऋषि-मुनियों के निष्काम, निःस्वार्थ और सत्यनिष्ठ जीवन को समझो। उन्होंने कहा कि शास्त्रों को समझने के लिए जितनी तपस्या चाहिए, वह बहुत समय से नहीं की गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि रामपुर दरबार में ऐसे लोग भी आए हैं जिन्होंने भरत और शारंगदेव जैसे महापुरुषों के ग्रंथों को अस्पष्ट कहकर उपहास किया, जिससे उन्हें अत्यंत कष्ट हुआ। उन्होंने बृहस्पति को स्मरण कराया कि उनके पूर्वज विद्वान एवं संगीत-मर्मज्ञ रहे हैं और यदि वे प्राचीन ग्रंथों को समझने के लिए तपस्या नहीं करेंगे तो और कौन करेगा।
उन्होंने विश्वास दिलाया कि परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने कहा कि भले ही वे स्वयं न रहें, किंतु शिष्य की सफलता से उनकी आत्मा को शांति मिलेगी और वही उनकी गुरुदक्षिणा होगी। अन्यथा वे सदा के लिए ऋणी बने रहेंगे।
आचार्य जी को अनुसंधान की प्रेरणा देने वाले दूसरे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामपुर राज्य के अनुपम ग्रंथागार के विद्वान एवं यशस्वी प्रबंधक मौलाना इम्तियाज अली खां अरशीद थे, जो बृहस्पति जी को अपना अंतरंग मित्र एवं सखा मानते थे।
Acharya Kailash Chandra Dev Brahaspati’s teachings and research laid the foundation for modern musicology in India. His work on Shruti Mandal and scientific interpretation of ancient musical texts continues to be referenced by scholars. Many of his students and followers have carried forward his legacy, ensuring that Indian classical music remains deeply rooted in its traditional values while evolving with time. His contributions have not only enriched the field of music but also inspired future generations to explore the depth and precision of Indian musical traditions.
Acharya Kailash Chandra Dev Brahaspati’s teachings and research laid the foundation for modern musicology in India. His work on Shruti Mandal and scientific interpretation of ancient musical texts continues to be referenced by scholars. Many of his students and followers have carried forward his legacy, ensuring that Indian classical music remains deeply rooted in its traditional values while evolving with time. His contributions have not only enriched the field of music but also inspired future generations to explore the depth and precision of Indian musical traditions.